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हवाई जहाज़ के टायरों में नाइट्रोजन गैस क्यों भरी जाती है, कारण जान दंग रह जाएंगे

दोस्तो हवा में 78 फीसदी तक नाइट्रोजन होती है, जबकि 21 फीसदी आक्सीजन और एक फीसदी अन्य गैस। नाइट्रोजन से रबर को कोई नुकसान नहीं होता, जबकि आक्सीजन से टायर खराब हो सकता है। आक्सीजन से टायर अक्सर अपनी इलास्टिसिटी और मजबूती खो देता है। ऐसे में आक्सीजन रबर के कणों पर अटैक कर देती है, जिससे टायर फटने का खतरा रहता है। 

नाइट्रोजन आक्सीजन की अपेक्षा कूल होती है और रबर फ्रेंडली है। हालांकि, नाइट्रोजन पूरी तरह शुद्ध नहीं होती। नाइट्रोफिल से टायर का इंफ्लेशन कम हो जाता है और वह टायर को सामान्य रहने में मदद करती है। नाइट्रोजन लंबे समय तक टायर में रह सकती है, जबकि आक्सीजन जल्दी बाहर निकल जाती है।
लैंडिंग के दौरान जहाज की स्पीड 250 से 300 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। लेकिन फिर भी इसके टायर नहीं फटते क्योंकि यह टायर बनाए ही कुछ खास तरीके से जाते हैं। इन टायरों को बनाने वाले रबड़ के साथ एल्युमीनियम और स्टील को मिक्स किया जाता है और हवाई जहाज के टायर में कार के टायर की बजाय 6 गुना ज्यादा प्रेशर से हवा भरी जाती है कि यह ज्यादा वजन को सहन कर सकें। 

इन टायरों में एक नॉर्मल गैस की बजाय नाइट्रोजन गैस भरी जाती है क्योंकि नाइट्रोजन गैस अन्य गैसों की तुलना में सूखी गैस होती है और हल्की भी होती है। इस गैस पर तापमान और दबाव का कोई खास असर नहीं पड़ता। इसलिए जिन टायरों में यह गैस भरी जाती है, वह कभी नहीं फटते क्योंकि उन टायरों में घर्षण होने के कारण आग लगने की कोई संभावना नहीं होती।

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